स्वामी विवेकानंद के मित्रों ने उन्हें शिकागो में होने वाली ‘विश्व धार्मिक संसद’ (World Parliament of Religions) में भाग लेने का सुझाव दिया । लेकिन स्वामीजी को न तो इस धार्मिक संसद की निर्धारित तिथियों की जानकारी थी और न ही उनके पास धार्मिक संसद में शामिल होने के लिए औपचारिक निमंत्रण पत्र था । वे संसद की निर्धारित अवधि के दो महीने पहले ही अमेरिका पहुँच गए और इस लंबे अंतराल में कुछ अपरिचित, उदारहृदय व्यक्तियों की मदद से उन्होंने वहाँ गुजारा किया । बोस्टन शहर में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राइट ने उन्हे संसद में सम्मिलित होने के लिए पहचान पत्र दिया । शिकागो के हेल परिवार के साथ तो उनकी जीवन पर्यंत चलने वाली प्रगाढ़ मित्रता कायम हो गई थी ।
11 सितंबर, 1893 के दिन स्वामी विवेकानंद ने विश्व धार्मिक संसद के श्रोतागणों को ज्यों ही “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहिनों” कहकर संबोधित किया, तत्क्षण उन्होंने सभी के हृदय जीत लिए । स्वामीजी ने समझाया कि सभी धर्म एक ही ईश्वर तक पहुंचाने वाले अलग-अलग मार्ग हैं । उन्होंने विभिन्न धर्म संप्रदायों की एक ही सागर की ओर बहने वाली पृथक-पृथक जलधाराओं से तुलना करी ।
” जिस प्रकार विविध उद्गमस्थलों से निकल कर बहने वाले भिन्न -भिन्न जलप्रवाहों का पानी अंततः सिंधु के जल में विलय हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अनेकों उपलब्ध मार्गों में से जिन भी विशिष्ट मार्गों का अपनी-अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार चयन करते हैं, चाहे वे परस्पर कितने भी अलग प्रतीत होते हैं एवं सही या गलत लगते हैं , हे परमात्मा, वे सभी मार्ग आपकी ओर ले जाने वाले रास्ते ही हैं ” ।
स्वामीजी को बारह से अधिक बार व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया । सभी को लगता था कि विवेकानंद किसी एक विशेष समुदाय के लिए नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवजाति के लिए बोलते थे ।
( यह वर्ष 1893 की विश्व धार्मिक संसद सभा का चित्र है )
स्वामी विवेकानंद के मित्रों ने उन्हें शिकागो में होने वाली ‘विश्व धार्मिक संसद’ (World Parliament of Religions) में भाग लेने का सुझाव दिया । लेकिन स्वामीजी को न तो इस धार्मिक संसद की निर्धारित तिथियों की जानकारी थी और न ही उनके पास धार्मिक संसद में शामिल होने के लिए औपचारिक निमंत्रण पत्र था । वे संसद की निर्धारित अवधि के दो महीने पहले ही अमेरिका पहुँच गए और इस लंबे अंतराल में कुछ अपरिचित, उदारहृदय व्यक्तियों की मदद से उन्होंने वहाँ गुजारा किया । बोस्टन शहर में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राइट ने उन्हे संसद में सम्मिलित होने के लिए पहचान पत्र दिया । शिकागो के हेल परिवार के साथ तो उनकी जीवन पर्यंत चलने वाली प्रगाढ़ मित्रता कायम हो गई थी ।
11 सितंबर, 1893 के दिन स्वामी विवेकानंद ने विश्व धार्मिक संसद के श्रोतागणों को ज्यों ही “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहिनों” कहकर संबोधित किया, तत्क्षण उन्होंने सभी के हृदय जीत लिए । स्वामीजी ने समझाया कि सभी धर्म एक ही ईश्वर तक पहुंचाने वाले अलग-अलग मार्ग हैं । उन्होंने विभिन्न धर्म संप्रदायों की एक ही सागर की ओर बहने वाली पृथक-पृथक जलधाराओं से तुलना करी ।
” जिस प्रकार विविध उद्गमस्थलों से निकल कर बहने वाले भिन्न -भिन्न जलप्रवाहों का पानी अंततः सिंधु के जल में विलय हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अनेकों उपलब्ध मार्गों में से जिन भी विशिष्ट मार्गों का अपनी-अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार चयन करते हैं, चाहे वे परस्पर कितने भी अलग प्रतीत होते हैं एवं सही या गलत लगते हैं , हे परमात्मा, वे सभी मार्ग आपकी ओर ले जाने वाले रास्ते ही हैं ” ।
स्वामीजी को बारह से अधिक बार व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया । सभी को लगता था कि विवेकानंद किसी एक विशेष समुदाय के लिए नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवजाति के लिए बोलते थे ।
( यह वर्ष 1893 की विश्व धार्मिक संसद सभा का चित्र है )