मन्नारासला में पूजा-अर्चना की सदियों पुरानी एक अनोखी परंपरा है, जिसमें परिवार की सबसे बड़ी महिला मुख्य पुजारिन बनती है; उनके बाद परिवार की दूसरी सबसे बड़ी महिला सदस्य यह ज़िम्मेदारी संभालती है। मुख्य पुजारिन को ‘अम्मा’ (माँ) कहा जाता है; जब किसी महिला को अगली ‘अम्मा’ के तौर पर चुना जाता है, तो वह ब्रह्मचर्य का व्रत लेती है और जीवन भर तपस्वी जैसा जीवन बिताती है।
मान्यताओं के अनुसार, जिस जगह पर परशुराम ने नागराज को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी, वही जगह मन्नारासला मंदिर बनी। यह जगह मंदार (एरिथ्रिना) के पेड़ों और कई औषधीय पौधों से घिरी हुई थी। जब नागराज परशुराम के सामने प्रकट हुए, तो वे वहाँ रहने, और अपनी उपस्थिति से उस भूमि को हमेशा आशीर्वाद देने, के लिए सहमत हो गए। इस तरह, मंदार के पेड़ों के बीच नागराज का निवास स्थान ‘मंदारासला’ कहलाया, जो बाद में ‘मन्नारासला’ के नाम से जाना जाने लगा। इस मंदिर की देखरेख मन्नारासला इल्लम (परिवार) द्वारा की जाती रही है।
एस. आर. रामानुजम की यह तस्वीर मन्नारासला मंदिर की है।
मन्नारासला में पूजा-अर्चना की सदियों पुरानी एक अनोखी परंपरा है, जिसमें परिवार की सबसे बड़ी महिला मुख्य पुजारिन बनती है; उनके बाद परिवार की दूसरी सबसे बड़ी महिला सदस्य यह ज़िम्मेदारी संभालती है। मुख्य पुजारिन को ‘अम्मा’ (माँ) कहा जाता है; जब किसी महिला को अगली ‘अम्मा’ के तौर पर चुना जाता है, तो वह ब्रह्मचर्य का व्रत लेती है और जीवन भर तपस्वी जैसा जीवन बिताती है।
मान्यताओं के अनुसार, जिस जगह पर परशुराम ने नागराज को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी, वही जगह मन्नारासला मंदिर बनी। यह जगह मंदार (एरिथ्रिना) के पेड़ों और कई औषधीय पौधों से घिरी हुई थी। जब नागराज परशुराम के सामने प्रकट हुए, तो वे वहाँ रहने, और अपनी उपस्थिति से उस भूमि को हमेशा आशीर्वाद देने, के लिए सहमत हो गए। इस तरह, मंदार के पेड़ों के बीच नागराज का निवास स्थान ‘मंदारासला’ कहलाया, जो बाद में ‘मन्नारासला’ के नाम से जाना जाने लगा। इस मंदिर की देखरेख मन्नारासला इल्लम (परिवार) द्वारा की जाती रही है।
एस. आर. रामानुजम की यह तस्वीर मन्नारासला मंदिर की है।