महारानी केम्पनंजम्मन्नी वाणी विलास सन्निधान ने १८९४ से अपने नाबालिग बेटे कृष्णराज वाडियार चतुर्थ के लिए राज-प्रतिनिधि के रूप में मैसूर रियासत पर शासन किया। जब जमशेदजी टाटा ने अपने शोध संस्थान के लिए जगह की तलाश की, तो महारानी की सरकार ने बेंगलुरु में ३७१ एकड़ और १६ गुंटा ज़मीन, पूंजीगत खर्चों के लिए धन और एक वार्षिक योगदान प्रदान किया।
इस सहायता ने उस स्थान और धनराशि की प्रत्याभूति हुई, जिससे भारतीय विज्ञान संस्थान स्थापित हुआ। भारतीय विज्ञान संस्थान से गुज़रने वाला हर एक अभियंत्री, वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार से जुड़े शोधकर्ता उस भूमि अनुदान के ऋणी हैं। इतिहास की पुस्तकें उनके पति और पुत्र पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं, फिर भी यह उनका प्रशासन ही था जिसने इस परिसर को संभव बनाया। वह इस बात की सशक्त याद दिलाती हैं कि महिलाओं ने न केवल विज्ञान का कार्य किया है, बल्कि उस आधार का भी निर्माण किया है जिस पर यह खड़ा है।
यह छवि भारतीय विज्ञान संस्थान में बने प्रारम्भिक भवनों की है।
महारानी केम्पनंजम्मन्नी वाणी विलास सन्निधान ने १८९४ से अपने नाबालिग बेटे कृष्णराज वाडियार चतुर्थ के लिए राज-प्रतिनिधि के रूप में मैसूर रियासत पर शासन किया। जब जमशेदजी टाटा ने अपने शोध संस्थान के लिए जगह की तलाश की, तो महारानी की सरकार ने बेंगलुरु में ३७१ एकड़ और १६ गुंटा ज़मीन, पूंजीगत खर्चों के लिए धन और एक वार्षिक योगदान प्रदान किया।
इस सहायता ने उस स्थान और धनराशि की प्रत्याभूति हुई, जिससे भारतीय विज्ञान संस्थान स्थापित हुआ। भारतीय विज्ञान संस्थान से गुज़रने वाला हर एक अभियंत्री, वैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार से जुड़े शोधकर्ता उस भूमि अनुदान के ऋणी हैं। इतिहास की पुस्तकें उनके पति और पुत्र पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं, फिर भी यह उनका प्रशासन ही था जिसने इस परिसर को संभव बनाया। वह इस बात की सशक्त याद दिलाती हैं कि महिलाओं ने न केवल विज्ञान का कार्य किया है, बल्कि उस आधार का भी निर्माण किया है जिस पर यह खड़ा है।
यह छवि भारतीय विज्ञान संस्थान में बने प्रारम्भिक भवनों की है।