नेताजी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध का प्रबल समर्थन किया, जिसके फलस्वरूप वे शीघ्र ही कांग्रेस की अध्यक्षता के पद तक पहुँच गए । किंतु, बाद में, महात्मा गांधी के साथ उपजे वैचारिक मतभेदों के कारण अंततः उन्होंने अपने इस पद से त्यागपत्र दे दिया।
जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के प्रति अन्य नेताओं का दृष्टिकोण भिन्न था, वहीं नेताजी ने युद्ध को भारत से ब्रिटिश सत्ता के उन्मूलन के लिए एक सुवर्ण अवसर के रूप में देखा।
जनवरी १९४१ में, वे साहसपूर्वक नजरबंदी से भाग निकले। मात्र दो माह के भीतर वे दिल्ली, लाहौर, पेशावर और काबुल के मार्ग से होते हुए बर्लिन पहुँच गए। वहाँ उन्होंने जर्मन नाजी नेतृत्व से भेंट की, किंतु नाज़ियों का मानना था कि भारत के लिए ब्रिटिश शासन ही उपयुक्त है।
इसके विपरीत, जापान से अधिक सहयोग का प्रस्ताव मिला; अतः फरवरी १९४३ में नेताजी एक पनडुब्बी के माध्यम से टोक्यो के लिए रवाना हुए । नेताजी की नीति सरल और स्पष्ट थी—वे उस किसी भी राष्ट्र के साथ सहयोग करने को तत्पर थे जो ब्रिटेन-विरोधी हो ।
जब द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के कगार पर था, तो उन्होंने सटीक पूर्वानुमान लगाया कि सोवियत संघ शीघ्र ही ब्रिटेन के साथ अपना गठबंधन भंग कर देगा। नेताजी संभवतः इसी लिए, अगस्त १९४५ में सोवियत नेतृत्व से संपर्क साधने के लिए निकले थे, किंतु वे रहस्यमयी तरीके से इतिहास के पन्नों में सदैव के लिए विलुप्त हो गए।
विकिमीडिया का यह चित्र मई १९४२ में हिटलर के साथ नेताजी की भेंट को प्रदर्शित करता है।
नेताजी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध का प्रबल समर्थन किया, जिसके फलस्वरूप वे शीघ्र ही कांग्रेस की अध्यक्षता के पद तक पहुँच गए । किंतु, बाद में, महात्मा गांधी के साथ उपजे वैचारिक मतभेदों के कारण अंततः उन्होंने अपने इस पद से त्यागपत्र दे दिया।
जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के प्रति अन्य नेताओं का दृष्टिकोण भिन्न था, वहीं नेताजी ने युद्ध को भारत से ब्रिटिश सत्ता के उन्मूलन के लिए एक सुवर्ण अवसर के रूप में देखा।
जनवरी १९४१ में, वे साहसपूर्वक नजरबंदी से भाग निकले। मात्र दो माह के भीतर वे दिल्ली, लाहौर, पेशावर और काबुल के मार्ग से होते हुए बर्लिन पहुँच गए। वहाँ उन्होंने जर्मन नाजी नेतृत्व से भेंट की, किंतु नाज़ियों का मानना था कि भारत के लिए ब्रिटिश शासन ही उपयुक्त है।
इसके विपरीत, जापान से अधिक सहयोग का प्रस्ताव मिला; अतः फरवरी १९४३ में नेताजी एक पनडुब्बी के माध्यम से टोक्यो के लिए रवाना हुए । नेताजी की नीति सरल और स्पष्ट थी—वे उस किसी भी राष्ट्र के साथ सहयोग करने को तत्पर थे जो ब्रिटेन-विरोधी हो ।
जब द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के कगार पर था, तो उन्होंने सटीक पूर्वानुमान लगाया कि सोवियत संघ शीघ्र ही ब्रिटेन के साथ अपना गठबंधन भंग कर देगा। नेताजी संभवतः इसी लिए, अगस्त १९४५ में सोवियत नेतृत्व से संपर्क साधने के लिए निकले थे, किंतु वे रहस्यमयी तरीके से इतिहास के पन्नों में सदैव के लिए विलुप्त हो गए।
विकिमीडिया का यह चित्र मई १९४२ में हिटलर के साथ नेताजी की भेंट को प्रदर्शित करता है।