ऋग्वेद संहिता और शतपथ ब्राह्मण ग्रंथों में स्वरभानु नामक असुर का उल्लेख है जो ग्रहणों का कारण था। एक लोकप्रिय पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान स्वरभानु ने एक देवता का वेश धारण कर अमृतपान किया। लेकिन सूर्य और चन्द्रमा ने देवताओं की पंक्ति में बैठे हुए इस असुर को पहचान लिया। उन दोनों के संकेत पर मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु ने तत्क्षण सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। चूँकि स्वरभानु अमृत पी चुका था, वह अमर हो गया। उसका कटा हुआ सिर राहु कहलाया, और धड़ केतु।
राहु और केतु समय-समय पर सूर्य और चन्द्रमा से प्रतिशोध लेने के लिए उन्हें निगलने का प्रयास करते हैं, जिससे सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होते हैं।
प्रारम्भिक वैदिक ज्योतिष विज्ञान आकाश में नक्षत्रों और तारों की स्थितियों पर आधारित था। कालांतर में ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों की संकल्पना का समावेश हुआ। नवग्रह समूह में राहु और केतु नामक दो तमो ग्रहों के अतिरिक्त सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि सम्मिलित हैं। इसमें पृथ्वी शामिल नहीं है।
तमो ग्रहों के द्वारा ग्रहणों के होने की अवधारणा भारतीय ज्योतिष में अद्वितीय है। केतु का उल्लेख प्राचीनतम भारतीय ग्रंथों में चमकीले धूमकेतुओं या उल्कापातों के रूप में मिलता है, जिन्हें अशुभ संकेत माना जाता था।
ऐसी मान्यता है की नवग्रह मनुष्य के जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। 5वीं शताब्दी से ही हिन्दू मंदिरों की मूर्तियों एवं उत्कीर्णनों में नवग्रहों को दिव्य रूप में दर्शाया गया है।
स्त्रोत: https://www.britannica.com/topic/navagraha
चित्र सौजन्य : भागवतम् कथा
ऋग्वेद संहिता और शतपथ ब्राह्मण ग्रंथों में स्वरभानु नामक असुर का उल्लेख है जो ग्रहणों का कारण था। एक लोकप्रिय पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान स्वरभानु ने एक देवता का वेश धारण कर अमृतपान किया। लेकिन सूर्य और चन्द्रमा ने देवताओं की पंक्ति में बैठे हुए इस असुर को पहचान लिया। उन दोनों के संकेत पर मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु ने तत्क्षण सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया। चूँकि स्वरभानु अमृत पी चुका था, वह अमर हो गया। उसका कटा हुआ सिर राहु कहलाया, और धड़ केतु।
राहु और केतु समय-समय पर सूर्य और चन्द्रमा से प्रतिशोध लेने के लिए उन्हें निगलने का प्रयास करते हैं, जिससे सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होते हैं।
प्रारम्भिक वैदिक ज्योतिष विज्ञान आकाश में नक्षत्रों और तारों की स्थितियों पर आधारित था। कालांतर में ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों की संकल्पना का समावेश हुआ। नवग्रह समूह में राहु और केतु नामक दो तमो ग्रहों के अतिरिक्त सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि सम्मिलित हैं। इसमें पृथ्वी शामिल नहीं है।
तमो ग्रहों के द्वारा ग्रहणों के होने की अवधारणा भारतीय ज्योतिष में अद्वितीय है। केतु का उल्लेख प्राचीनतम भारतीय ग्रंथों में चमकीले धूमकेतुओं या उल्कापातों के रूप में मिलता है, जिन्हें अशुभ संकेत माना जाता था।
ऐसी मान्यता है की नवग्रह मनुष्य के जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। 5वीं शताब्दी से ही हिन्दू मंदिरों की मूर्तियों एवं उत्कीर्णनों में नवग्रहों को दिव्य रूप में दर्शाया गया है।
स्त्रोत: https://www.britannica.com/topic/navagraha
चित्र सौजन्य : भागवतम् कथा