भारतेंदु हरिश्चंद्र बनारस के महाराजा के वित्तपोषकों के वंशज थे। 5 साल की उम्र तक वे ब्रजभाषा के छंदों की व्याख्या कर सकते थे, और 12 साल की उम्र तक उन्होंने ‘रस’ की अवधारणा को पारंपरिक 9 से बढ़ाकर 14 कर दिया था। उन्होंने क्वींस कॉलेज में पढ़ाई की। वे बहुत ही शान-शौकत से रहते थे, अपना समय बनारस की सड़कों पर आम लोगों के साथ बिताते थे, और खुले दिल से पैसे व सामान दान करते थे। उन्होंने महाराजा की बात मानने से भी इनकार कर दिया था, जो उनकी फिजूलखर्ची की आदतों को पसंद नहीं करते थे।
उन्होंने संस्कृत, फ़ारसी और अंग्रेज़ी सीखी, और 17 साल की उम्र तक वे एक कवि के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। उन्होंने पारंपरिक भाषाओं का विरोध किया और एक ऐसी भाषा को बढ़ावा देना चाहा जो आम लोगों की बोलचाल की भाषा के करीब हो। उन्होंने दो पत्रिकाएँ शुरू कीं—’कवि वचन सुधा’ (1867) और ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ (1873)। इन पत्रिकाओं में इस्तेमाल की गई भाषा बोलचाल वाली हिंदी थी। ये पत्रिकाएँ बेहद लोकप्रिय हुईं और इनके साथ ही आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत हुई। उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान हिंदी नाटक के क्षेत्र में था, जहाँ उन्होंने हिंदी समाज के मूल मूल्यों और परंपराओं पर ज़ोर दिया। उन्होंने उस समय तेज़ी से अपनी जगह बना रहे पश्चिमी और पारसी थिएटर का मुकाबला किया। हरिश्चंद्र वैष्णव धर्म के भी कट्टर अनुयायी थे।
स्रोत: Remembering Bharatendu Harishchandra, मदन गोपाल, Indian Literature
चित्र श्रेय: Wikimedia Commons
भारतेंदु हरिश्चंद्र बनारस के महाराजा के वित्तपोषकों के वंशज थे। 5 साल की उम्र तक वे ब्रजभाषा के छंदों की व्याख्या कर सकते थे, और 12 साल की उम्र तक उन्होंने ‘रस’ की अवधारणा को पारंपरिक 9 से बढ़ाकर 14 कर दिया था। उन्होंने क्वींस कॉलेज में पढ़ाई की। वे बहुत ही शान-शौकत से रहते थे, अपना समय बनारस की सड़कों पर आम लोगों के साथ बिताते थे, और खुले दिल से पैसे व सामान दान करते थे। उन्होंने महाराजा की बात मानने से भी इनकार कर दिया था, जो उनकी फिजूलखर्ची की आदतों को पसंद नहीं करते थे।
उन्होंने संस्कृत, फ़ारसी और अंग्रेज़ी सीखी, और 17 साल की उम्र तक वे एक कवि के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। उन्होंने पारंपरिक भाषाओं का विरोध किया और एक ऐसी भाषा को बढ़ावा देना चाहा जो आम लोगों की बोलचाल की भाषा के करीब हो। उन्होंने दो पत्रिकाएँ शुरू कीं—’कवि वचन सुधा’ (1867) और ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ (1873)। इन पत्रिकाओं में इस्तेमाल की गई भाषा बोलचाल वाली हिंदी थी। ये पत्रिकाएँ बेहद लोकप्रिय हुईं और इनके साथ ही आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत हुई। उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान हिंदी नाटक के क्षेत्र में था, जहाँ उन्होंने हिंदी समाज के मूल मूल्यों और परंपराओं पर ज़ोर दिया। उन्होंने उस समय तेज़ी से अपनी जगह बना रहे पश्चिमी और पारसी थिएटर का मुकाबला किया। हरिश्चंद्र वैष्णव धर्म के भी कट्टर अनुयायी थे।
स्रोत: Remembering Bharatendu Harishchandra, मदन गोपाल, Indian Literature
चित्र श्रेय: Wikimedia Commons